किसानों को बदलते जलवायु परिवर्तन से फसल रक्षा करनी है, तो उन्हें कई फसलें लगानी चाहिए. कई फसलों को लगाकर किसान खेती में आने वाले जोखिमों को कम कर सकते हैं. इस तरह से अगर किसी एक फसल में घाटा हो भी जाता है तो पूरा पैसा नहीं डूबेगा. ज्यादातर औषधिय और सगंध फसलें जलवायु परिवर्तन के प्रति सहनशील होती है. किसानों को मुख्य खाद्यान्न के साथ इनकी अंतर फसलीय खेती करने से खेती की लागत कम होती है और मुनाफा बढ़ता है.
केंद्रीय औषधि एवं सगंध पौधा संस्थान (सीमैप) के भारत में स्थापित बंगलौर, हैदराबाद, पंतनगर, पुरारा, गाँधीनगर और जोरहाटक के रिसोर्स केन्द्र – औषधिय और सगंध फसलें उगाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित करते हैं. खास बात यह है की संस्थान किसानों और उद्यमियों की बैठक भी कराती है. जिससे औषधिय एवं सगंध तेलों के खरीदार उद्यमी और किसानों की मुलाकात हो सके और दोनों अपनी बातों को एक-दुसरे से बाँट सके. जिससे किसानों को बाजार में खरीदार ढूंढऩे में मश्क्कत नहीं करनी पड़ती और उद्यमियों को बाजार से कम कीमत पर कच्चा माल मिल जाता है. यह किसान और उद्यमियों दोनों के लिए फायदे का सौदा बन रहा है. दूसरी खास बात यह है की उद्यमी खुद किसानों के लिए बीज उनके दरवाजे पर उपलब्ध करवाते हैं और फसल तैयार होने पर किसान के खेत या दरवाजे से उठवा भी लेते हैं. संस्थान किसानों को खेती के हर स्तर पर सुझाव और बचाव के परामर्श भी देता है.
बहुत से किसान मैथा, अर्टीमिसिया, पामारोजा, सिट्रोनीला, खस, पिपरमिंट, अश्वगंधा, नींबू घास, सतावार, तुलसी की खेती कर रहे हैं. छोटी जोत के किसानों को इनकी खेती करने से ज्य़ादा लाभ मिलता है. जहां धान और गेहूं जैसी पारंपरिक फसलों से किसान को अधिकतम 50 हज़ार रुपए प्रति हैक्टेयर मुनाफा मिलता है वहीं पिपरमिंट जैसी फसलों से एक हैक्टेयर में मुनाफा 1 लाख रुपए तक मिल सकता है.
क्या आपको पता है कि ठंडा-ठंडा कूल कूल करने वाले तेल में मेंथा ऑयल है. गुलाब की खुशबू देने वाले साबुन में पामारोजा से निकलने वाला जिरैनियॉल मौजूद है. मच्छर दूर भगाने के लिए शरीर पर लगाई जाने वाली क्रीम में सिट्रोनीला ऑयल है.
मेंथा की खेती उत्तर प्रदेश में लगभग दो लाख हेक्टेयर में की जाती है. इसमें प्रदेश में लगभग तीन लाख किसान परिवार लगे हुए हैं. वहीं खस की खेती उत्तर प्रदेश में लगभग दस हजार हेक्टेयर में की जाती है. और दूसरी फसलें जैसे- अश्वगंधा, नींबू घास, सतावार आदि कि खेती लगभग बीस हजार हेक्टेयर में और धीरे-धीरे इन सभी फसलों की खेती का क्षेत्रफल बढ़ता ही जा रहा है.


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