Monday, May 18, 2015

उत्पादन बढ़ाना है तो लघु किसान को बचाना ही होगा



भारत में लघु, सीमांत किसानों और कृषि कामगारों के बिना कृषि की कल्पना नहीं की जा सकती और गांवों के बिना कोई लघु, सीमांत किसान और कृषि कामगार नहीं रह सकता. यह सामाजिक तौर पर देश के हित में है कि इन छोटी जोत वाले किसानों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी होती रहे पर साथ ही यह प्रयास होता रहे कि यें कृषि कार्यों से विमुख न हों. राष्ट्र को इन किसानों की उपज की उत्पादकता बढ़ाने में सहयोग देते रहना चाहिए. इन्हें आधुनिक संगत मशीनरी और खेती की नवीनतम पद्धति से भी परिचित कराते रहना चाहिए. कृषि वैज्ञानिक द्वारा समय-समय पर मौसम और फसल सम्बन्धी परामर्श मिलती रहनी चाहिए.
एक बार फिर बिन मौसम बारिश और दिल्ली में सार्वजनिक तौर पर हुई आत्महत्या ने भारत में लंबे समय से उपेक्षित पड़े कृषि और गांव के मुद्दे को फिर से चर्चा में ला दिया.
विकास यानी शहरीकरण
स्वतंत्रता के बाद शहरीकरण विकास की पूर्व शर्त बन गया. यह माना गया की बिना शहरीकरण हुए गाँवों का विकास नहीं हो सकता. इससे पलायन बढ़ा और गांव हाशिये पर चले गए. शहरों का विस्तार होता गया और वे गाँवों में घुस कर उसे शहर बनाने लगे. उपजाऊ जमींन बिचने लगी और कंक्रीट का फैलाव होता गया. महंगे बीज, उर्वरक और कीटनाशक, गिरता भूजल स्तर, बढ़ती मजदूरी के कारण खेती की लागत में बेतहाशा बढ़ोतरी हो चुकी है. ऐसे में बिना कर्ज लिए खेती संभव नहीं रह गई है. गांवों में आज गरीबी की निशानी कच्चा घर बन गया है. सभी दल ग्रामीण इलाकों के हितों के नारे लगाते हैं और गांवों, ग्रामीणों और खेती को प्रोत्साहित करने की बात करते हैं.
यह विडंबना ही है कि जिस देश में दो तिहाई लोग खेती पर आश्रित हैं और गांवों में रहते हैं, उस किसान को सिर्फ वोट की नजर से देखा जाता है. राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) की 2003 की रिपोर्ट कहती है कि यदि कृषि से अलग अन्य कोई स्थाई रोजगार मिले तो देश के 40 फीसदी किसान खेती छोड़ने को तैयार हैं. फिर इन परिस्थितियों में भारत के समक्ष खेती और खाद्य सुरक्षा का सबसे बड़ा खतरा उत्पन्न होना है. विषय का पूर्व संदर्भ और मूल कारणों को जाने बिना ग्रामीण और कृषि अर्थशास्त्र के संकट की भयावहता को समझ पाना दुष्कर है. वास्तव में ईमानदारी से सब बातों को समझने की आवश्यकता है.
पर्याय हैं गांव और कृषि
भारत में ग्रामीण जीवन को कृषि से अलग किया ही नहीं जा सकता. भारत में कृषि का भविष्य गांवों पर आधारित है. यदि भारत में गांव नहीं रहे तो खेती समाप्त हो जाएगी. भारत में खेती के लिए गांव इसलिए जरूरी हैं क्योंकि छोटे और सीमांत किसान जिनके पास पांच एकड़ से कम भूमि है, वे खेती पर आश्रित जनसंख्या का 85 प्रतिशत हैं. वे केवल गांवों में ही रहते हैं. उनके बिना भारतीय खेती मर जाएगी. वर्ष 2050 में भारत की जनसंख्या यदि 160 करोड़ रही तो ग्रामीण जनसंख्या इसकी आधी होगी. दस साल पहले भारत में लघु और सीमांत किसान परिवारों की संख्या 9.80 करोड़ थी जो अब 11.70 करोड़ हो गई है.
कृषि जनसंख्या के आंकड़ों के मुताबिक लघु और सीमांत किसान परिवार घरों की संख्या, कुल 13.80 करोड़ किसान परिवार घरों का 85 फीसदी है. उल्लेखनीय है कि 1961 में इनकी संख्या 62 फीसदी, 1991 में 78 फीसदी, 2001 में 81 फीसदी और 2011 में 85 फीसदी हो गई.
मजेदार तथ्य यह भी है कि लघु और सीमांत किसान बड़े खेतों वाले किसानों के मुकाबले कम क्षमतावान हों, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है बल्कि ये अपेक्षाकृत अधिक उत्पादक हैं. ये 46 फीसदी खेती योग्य भूमि कृषि के काम लेते हैं और 52 फीसद अनाज, 70 फीसदी सब्जियां और 55 फीसदी फलों की पैदावार के साथ 69 फीसदी दूध भी संकलित करते हैं.
रूस में घरेलू पारिवारिक खेती करने वालों के पास तीन फीसदी कृषि योग्य भूमि है लेकिन रूस के लोगों द्वारा खाई जाने वाले सामग्री का 50 फीसदी पैदा करते हैं.
स्पष्ट हैं समीकरण
1950-51 में देश के जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान 55% था जो कि आज 15% से भी कम रह गया है जबकि इस दौरान कृषि पर निर्भर लोगों की तादाद 24 करोड़ से बढ़कर 72 करोड़ हो गई है. यही कारण है कि खेती पर निर्भर लोगों की आमदनी घटती जा रही है. कृषि क्षेत्र में कम आमदनी के कारण ही गांवों से शहरों की ओर पलायन शुरू हो गया है. इसकी पुष्टि 2011 की जनगणना के आंकड़ों से होती है जिसके मुताबिक पिछले एक दशक में किसानों की कुल तादाद में 90 लाख की कमी आई है, अर्थात हर रोज 2460 किसान खेती छोड़ रहे हैं. सच्चाई यह है कि छोटे किसान मजदूर बन रहे हैं. उन्हें देश के किसी भी महानगर के दड़बेनुमा कमरों में देखा जा सकता है.
भारत में लघु और सीमांत किसान अधिकतर अपने इस्तेमाल के लिए ही खेती करते हैं. यूएनडीपी की 2009 की रिपोर्ट के मुताबिक खाद्य पैदावार के कुल बाजार अधिशेष में इनकी हिस्सेदारी 20 फीसदी है. भारत की खाद्य सुरक्षा उन्हीं पर निर्भर रहती है. खाद्य एवं कृषि संगठन के मुताबिक भारत की कृषि अर्थव्यवस्था इन लघु व सीमांत किसानों पर ही बहुत अधिक निर्भर है.
जाहिर है की भारत में खाद्य सुरक्षा और कृषि अर्थव्यवस्था के लिए लघु किसान और लघु खेती का जीवित रहना आवश्यक है? लघु किसान अपने खेतों पर नहीं, वे इनके आसपास ही रहते हैं. उन्हें खेतों से अलग नहीं किया जा सकता. वे कस्बों और शहरों में रहकर खेती का प्रबंधन नहीं कर सकते. उन्हें गांवों में ही रहना पड़ेगा. उन्हें रहने के लिए गांवों की आवश्यकता है. समीकरण बिलकुल स्पष्ट है.
भारत में लघु और सीमांत किसानों के बिना कृषि की कल्पना नहीं की जा सकती और गांवों के बिना कोई लघु और सीमांत किसान नहीं रह सकता. वे भारत के कृषि के लिए  महत्वपूर्ण संपत्ति हैं. यह सामाजिक तौर पर देश के हित में है कि इन छोटी जोत वाले किसानों की संख्या में बढ़ोतरी होती रहे. राष्ट्र को इन किसानों की उपज की उत्पादकता बढ़ाने में सहयोग देना चाहिए. इन्हें अधिक से अधिक साधन-संपन्न बनाना चाहिए.
यह भी सही है की छोटे किसान यदि अपना सादा जीवन फिर अपना सके, खेतों को फिर से रसायनों से मुक्त कर जैविक बना सके और शहर के दिखावा को छोड़ सके तो न तो कर्ज की नौबत आएगी और न आत्महत्या की.

कैसे करे उत्तम बीज का चुनाव

भारतवर्ष कृषि प्रधान देश है, जिसकी अर्थव्यवस्था में कृषि रीढ़ की हड्डी के समान है. हमारे देश प्रदेश में हमारी आजीविका का प्रमुख साधन #कृषि है. हमेशा से और आज भी कृषि उत्पादन में बीजों की भूमिका अत्याधिक महत्वपूर्ण रही है. बीज खेती की नींव का आधार और मूलमंत्र है. अत: उत्तम  गुणवत्ता वाले बीज से, फसलों का भरपूर उत्पादन प्राप्त होता है.

#किसान  भाई जानते हैं, कि उत्तम गुणवत्ता वाला बीज सामान्य बीज की अपेक्षा 20 से 25 प्रतिशत अधिक कृषि उपज देता है. अत: शुद्ध एवं स्वस्थ्य ”प्रमाणित बीज” अच्छी पैदावार का आधार होता है. प्रमाणित बीजों का उपयोग करने से जहां एक ओर अच्छी पैदावार मिलती है वहीं दूसरी ओर समय एवं पैसों की बचत होती है. किसान भाई अगर अशुद्ध बीज बोते व तैयार करते हैं तो उन्हे इससे न अच्छी पैदावार मिलती है और न बाजार में अच्छी कीमत. अशुद्ध बीज बोने से एक ओर उत्पादन तो कम होता ही है और दूसरी ओर अशुद्ध बीज के फलस्वरूप भविष्य के लिए अच्छा बीज प्राप्त नहीं होता है बल्कि अशुद्ध बीज के कारण खेत में खरपतवार उगने से नियंत्रण के लिए अधिक पैसा खर्चा करना एवं अन्त में उपज का बाजार भाव कम प्राप्त होता है, जिससे किसानों को अपनी फसल का उचित लाभ नहीं प्राप्त होता है. यदि किसान भाई चाहें कि उनके अनावश्यक खर्चे घटें और अधिक उत्पादन व आय मिले तो उन्हे फसलों के प्रमाणित बीजों का उत्पादन एवं उपयोग करना होगा.

कृषि उत्पादन में बीज का महत्वपूर्ण योगदान है. एक ओर ”जैसा बोओगे वैसा काटोगे” यह मर्म किसानों की समझ में आना चाहिए इसलिए अच्छी किस्म के बीजों का उत्पादन जरूरी है. दूसरी ओर सर्व गुणों युक्त उत्तम बीज की कमी रहती है. इसलिए बीज उत्पादन को उद्योग के रूप में अपनाकर कृषक जहां स्वयं के लिए उत्तम बीज की मांग की पूर्ति कर सकते हैं, वहीं इसे खेती के साथ साथ #रोजगार स्वरूप अपनाकर अतिरिक्त #आय का साधन बना सकते हैं तथा राज्य के कृषि उत्पादन को बढ़ाने में सहयोग दे सकते हैं.
प्रदेश में बेहतर लक्षणों से युक्त बीजों की मांग बढ़ाने और इसको उपलब्ध कराने में, राज्य स्तर की बीज प्रमाणीकरण संस्था ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. अनुसंधान से प्राप्त नई उन्नत किस्मों के केन्द्रक बीज बहुत कम मात्रा में उपलब्ध हो पाता है. बीजों की अनुवांशिक लक्षण एवं गुणवत्ता हर स्तर पर बनी रहे, इसलिए उत्पादित बीजों को तीन श्रेणियों में रखा जाता है.
1. प्रजनक बीज
अनुवांशिक शुध्दता का बीज उत्पादन और उनको कृषकों को उपलब्ध होना, उत्तम प्रजनक बीजों के उत्पादन पर निर्भर रहता है. प्रजनक बीज अधिकृत प्रजनक विशेषज्ञ की देख रेख में तैयार किया जाता है. यह आधार बीज उत्पादन का मूल स्त्रोत होता है. इस बीज की थैली पर सुनहरे पीले रंग का बीज के विवरण का लेबल (टैग) लगा होता है. जिस पर फसल प्रजनक विशेषज्ञ के हस्ताक्षर होते हैं.
2. आधार बीज
यह बीज प्रजनक बीज की संतति होती है. जिसे बीज प्रमाणीकरण संस्था की देखरेख में निर्धारित मानकों पर पाये जाने पर प्रमाणित किया जाता है. आधार बीज की थैलियों पर सफेद रंग का प्रमाणीकर लेबल (टैग) लगा होता है जिस पर संस्था के अधिकृत अधिकारी के हस्ताक्षर होते है.
3. प्रमाणित बीज
आधार बीज से द्विगुणन कर प्रमाणित बीज तैयार किया जाता है. जिसे बीज प्रमाणीकरण संस्था द्वारा निर्धारित मानक अनुसार पाये जाने पर प्रमाणित किया जाता है. प्रमाणित बीज की थैलियों पर नीले रंग का प्रमाणीकरण लेबल (टैग) लगा होता है. जिस पर संस्था के अधिकृत अधिकारी के हस्ताक्षर होते है.

किसान भाई बीजों को पहचाने और सही #बीज का ही चुनाव कर अपनी फसल उत्पादन को बढ़ाएं और ठगे जाने से बचे.

औषधिय और सगंध फसलों के साथ करें बहुफसली खेती

 किसानों को बदलते जलवायु परिवर्तन से फसल रक्षा करनी है, तो उन्हें कई फसलें लगानी चाहिए. कई फसलों को लगाकर किसान खेती में आने वाले जोखिमों को कम कर सकते हैं. इस तरह से अगर किसी एक फसल में घाटा हो भी जाता है तो पूरा पैसा नहीं डूबेगा. ज्यादातर औषधिय और सगंध फसलें जलवायु परिवर्तन के प्रति सहनशील होती है. किसानों को मुख्य खाद्यान्न के साथ इनकी अंतर फसलीय खेती करने से खेती की लागत कम होती है और मुनाफा बढ़ता है.

केंद्रीय औषधि एवं सगंध पौधा संस्थान (सीमैप) के भारत में स्थापित बंगलौर, हैदराबाद, पंतनगर, पुरारा, गाँधीनगर और जोरहाटक के  रिसोर्स केन्द्र – औषधिय और सगंध फसलें उगाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित करते हैं. खास बात यह है की संस्थान किसानों और उद्यमियों की बैठक भी कराती है. जिससे औषधिय एवं सगंध तेलों के खरीदार उद्यमी और किसानों की मुलाकात हो सके और दोनों अपनी बातों को एक-दुसरे से बाँट सके. जिससे किसानों को बाजार में खरीदार ढूंढऩे में मश्क्कत नहीं करनी पड़ती और उद्यमियों को बाजार से कम कीमत पर कच्चा माल मिल जाता है. यह किसान और उद्यमियों दोनों के लिए फायदे का सौदा बन रहा है. दूसरी खास बात यह है की उद्यमी खुद किसानों के लिए बीज उनके दरवाजे पर उपलब्ध करवाते हैं और फसल तैयार होने पर किसान के खेत या दरवाजे से उठवा भी लेते हैं. संस्थान किसानों को खेती के हर स्तर पर सुझाव और बचाव के परामर्श भी देता है.

बहुत से किसान मैथा, अर्टीमिसिया, पामारोजा, सिट्रोनीला, खस, पिपरमिंट, अश्वगंधा, नींबू घास, सतावार, तुलसी की खेती कर रहे हैं. छोटी जोत के किसानों को इनकी खेती करने से ज्य़ादा लाभ मिलता है. जहां धान और गेहूं जैसी पारंपरिक फसलों से किसान को अधिकतम 50 हज़ार रुपए प्रति हैक्टेयर मुनाफा मिलता है वहीं पिपरमिंट जैसी फसलों से एक हैक्टेयर में मुनाफा 1 लाख रुपए तक मिल सकता है.
क्या आपको पता है कि ठंडा-ठंडा कूल कूल करने वाले तेल में मेंथा ऑयल है. गुलाब की खुशबू देने वाले साबुन में पामारोजा से निकलने वाला जिरैनियॉल मौजूद है. मच्छर दूर भगाने के लिए शरीर पर लगाई जाने वाली क्रीम में सिट्रोनीला ऑयल है.

मेंथा की खेती उत्तर प्रदेश में लगभग दो लाख हेक्टेयर में की जाती है. इसमें प्रदेश में लगभग तीन लाख किसान परिवार लगे हुए हैं. वहीं खस की खेती उत्तर प्रदेश में लगभग दस हजार हेक्टेयर में की जाती है. और दूसरी फसलें जैसे- अश्वगंधा, नींबू घास, सतावार आदि कि खेती लगभग बीस हजार हेक्टेयर में और धीरे-धीरे इन सभी फसलों की खेती का क्षेत्रफल बढ़ता ही जा रहा है.

एरोबिक धान लड़ेगा सूखे से



एक गिलास पानी से एक किलो धान की उपज. सुनकर कौन किसान भाई हैरान नहीं हो जाएगा पर यकीन मानिए अब यह हकीक़त बन चूका है. इस हकीक़त को सच कर दिखलाया है भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्, पटना के वैज्ञानिकों ने जिन्होंने नई एरोबिक धान की प्रजाति विकसित की है जो सूखा प्रभावित क्षेत्रों के काफी असरदार होगी. इसके लिए बहुत कम पानी की जरूरत होगी. फ़िलहाल अभी तक तो एक किलो धान उपजाने में तक़रीबन एक हजार लीटर पानी खर्च हो जाता है.
अगले वर्ष से किसानों को यह बीज मिल सकेगा. एरोबिक धान की खेती से किसानों की लागत काफी कम हो जाएगी. एकतरफ जहाँ पानी पर लगने वाले खर्च की बचत होगी वहीँ इसके बीज की सीधे बुआई होने से दो बार होने वाले खर्च से भी बचत होगी और खेत में पानी जमा रखने की जरूरत नहीं होगी. हल्की सिंचाई से ही अच्छा उत्पादन मिलेगा.
इस बीज से तैयार धान को 20 दिनों तक पानी नहीं मिलने पर यह मुरझाएगा नहीं और इसकी फसल 120-125 दिनों में हो जाएगी. सामान्य स्थिति में उपज (प्रति हेक्टेयर) 45 से 55 क्विंटल तो सूखे की स्थिति में 30 से 35 क्विंटल होने की उम्मीद है.  
बिहार-झारखंड को अधिक लाभ
बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, एमपी, आंध्र, ओडीशा सहित ऊंचे इलाकों को अगैती खेती से रबी उत्पादन में अधिक लाभ मिलेगा तथा  लागत भी कमी आएगी. इससे तैयार चावल लंबा-हल्का सुनहला व स्वाद में बेहतर होगा.
उन्नत मशीनरी बनेगी सहायक
डीजल हल और पॉवर विडर से धान की खेती आसान हो जाती है. पॉवर विडर को जहाँ विशेषतः धान की खेती के लिए बनाया गया है वहीँ डीजल हल को सारे खेती के कामों के लिए बनाया गया है. डीजल हल बागवानी और कृषि के साथ-साथ पहाड़ी, मैदानी दोनों जमीनों पर आसानी से खेती को आसान बना देता है. यह छोटे खेतों और उन पहाड़ी खेतों में जहाँ ट्रेक्टर से खेती नहीं की जा सकती वहां भी खेती को आसान बना देता है. धान को बोने से लेकर काटने तक के कार्य अंगद डीजल हल और पॉवर विडर के द्वारा सरलता से हो जाता है. इससे महिलाएं और पुरुष सामान रूप से खेती कर सकते हैं. यह आपके मजदूरी लागत और समय को बचाता है और इससे ट्रेक्टर की अपेक्षा लागत भी काफी कम आती है. 

Tuesday, May 12, 2015

समय पर दस्तक देगा मानसून पर अल-नीनो का संकट टला नहीं



मौसम विभाग की भविष्यवाणी की माने तो #दक्षिणी-पश्चिमी #मानसून एक जून को केरल में दस्तक दे सकता है. विभाग का मानना है कि अनुमानतः मानसून चार दिन आगे या पीछे भी पहुंच सकता है. आमतौर पर देखें तो मानसून केरल में पहली जून तक दस्तक दे देता है. ऐसे में यदि इस साल मानसून सामान्‍य रहता है तो यह किसानों की अर्थव्‍यवस्‍था के लिहाज से अच्‍छी खबर होगी. हालांकि, मौसम विभाग के पूर्वानुमान के मुताबिक जून से सितंबर तक चलने वाले दक्षिण पश्चिम मानसून में बारिश दीर्घकालिक औसत के 93 फीसदी रहने की संभावना है. इसके बावजूद अभी #अल-नीनो का खतरा टला नहीं है. #वर्ल्ड मेट्रोलोजिकल ऑर्गनाइजेशन दक्षिण एशिया के ज्यादातर हिस्सों में अल-नीनो के चलते सामान्य से कम बारिश होने की आशंका जता चुका है.
गौरतलब है कि दक्षिणी-पश्चिमी मानसून #खेती, किसानी के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. #खरीफ फसलें मसलन #चावल, #सोयाबीन, #कपास और मक्के की खेती मानसूनी बारिश पर बहुत हद तक निर्भर रहती हैं. देश की 60 प्रतिशत खेती मानसूनी वर्षा पर आधारित है.
22 अप्रैल को आईएमडी द्वारा जारी पहले पूर्वानुमान के मुताबिक जून से सितंबर तक चलने वाले दक्षिण पश्चिम मानसून में सामान्य मानसून की संभाव्यता 28 फीसदी है. मौसम विभाग लंबी अवधि के औसत के आधार 96 फीसदी से 104 फीसदी के दायरे को सामान्य, 105 से 110 फीसदी एलपीए को सामान्य से ज्यादा और 110 फीसदी को अत्यधिक बारिश मानता है. चार महीने के मानसून सीजन (जून-सितंबर) में पूरे साल के दौरान होने वाली बारिश में इसकी तीन चौथाई हिस्सेदारी होती है.
अंतरराष्ट्रीय एंजेसियों ने जताया अल नीनो का खतरा
वर्ल्ड मेट्रोलोजिकल ऑर्गनाइजेशन के मुताबिक दक्षिण एशिया के ज्यादातर हिस्सों में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है. इसके मुताबिक मध्य और पश्चिमोत्तर भारत के अधिकांश भागों में 25-40 फीसदी कम बारिश होने की आशंका है.
अमेरिका के जलवायु पूर्वानुमान केंद्र (सीपीसी) और ऑस्ट्रेलिया के मौसम विज्ञान ब्यूरो ने इस गर्मी में अल नीनो की भविष्यवाणी की है. सीपीसी ने इस साल 50-60 फीसदी अल नीनो प्रभाव की आशंका जताई है. एजेंसी पहले ही घोषणा कर चुकी है कि प्रशांत महासागर में कमजोर अल नीनो की स्थिति पनप रही है. वहीं ऑस्ट्रेलियाई एजेंसी ने 70 फीसदी अल नीनो की संभावना जताई है.
स्काई-मेट सर्विसेज के मुताबिक इस साल देश में सामान्य मानसून की संभावना है. स्काई-मेट ने 102 फीसदी बारिश का अनुमान लगाया है. स्काई-मेट के आंकड़ों के मुताबिक जब भी अलनीनो का असर हुआ है तो 90 फीसदी मामलों में मानसून के दौरान बारिश सामान्य से कम हुई है. 2002, 2004, 2009 और 2014 में अलनीनो के कारण देश में सूखा जैसे हालात पैदा हुए थे.