Wednesday, February 3, 2016

मटर की खेती से धनवर्षा


संसार की एक महत्वपूर्ण फसल मटर को दलहनों की रानी की संज्ञा प्राप्त है. मटर की खेती, हरी फल्ली, साबूत मटर तथा दाल के लिये की जाती है. मटर की हरी फल्लियाँ सब्जी के लिए तथा सूखे दानों का उपयोग दाल और अन्य भोज्य पदार्थ तैयार करने में किया जाता है. चाट व छोले बनाने में मटर का विशिष्ट स्थान है. हरी मटर के दानों को सुखाकर या डिब्बा बन्द करके संरक्षित कर बाद में उपयोग किया जाता है. पोषक मान की दृष्टि से मटर के 100 ग्राम दाने में औसतन 11 ग्राम पानी, 22.5 ग्राम प्रोटीन, 1.8 ग्रा. वसा, 62.1 ग्रा. कार्बोहाइड्रेट, 64 मिग्रा. कैल्शियम, 4.8 मिग्रा. लोहा, 0.15 मिग्रा. राइबोफ्लेविन, 0.72 मिग्रा. थाइमिन तथा 2.4 मिग्रा. नियासिन पाया जाता है. फलियाँ निकालने के बाद हरे व सूखे पौधों का उपयोग पशुओं के चारे के लिए किया जाता है. दलहनी फसल होने के कारण इसकी खेती से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है. हरी फल्लिओं के लिए मटर की खेती करने से उत्तम खेती और सामान्य परिस्थिओं में प्रति एकड़ 50-60 क्विंटल हरी फल्ली प्राप्त होती है जिसका बाजार मूल्य 10 रुपये प्रति किलोग्राम भी जोड़ा जाये तो कुल राशि 50-60 हजार रुपये आती है, जिसमे 15-20 हजार रुपए खेती का खर्च घटा दिया जाये तो शुद्ध 35-40 हजार रुपये का मुनाफा पर प्राप्त हो सकता है. कम समय में अधिक मुनाफा कमाने के लिए यह एक अच्छा विकल्प है. इसके अलावा अगली फसल के लिए खेत भी शीघ्र रिक्त हो जाता है, यानि कि सोने पर सुहागा. छत्तीसगढ प्रदेश में मटर की खेती कुल 47.65 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में प्रचलित है, जिससे 26.45 हजार टन दाना उपज प्राप्त है . प्रदेश में मटर के दानों की औसत उपज बहुत कम (555 किग्रा./हैक्टर) है, जिसे बढ़ाने हेतु किसान भाइयों को आधुनिक सस्य तकनीक को आत्मसात करना होगा. प्रति इकाई अधिकतम हरी फल्लियाँ अथवा दानो की उपज प्राप्त करने हेतु आधुनिक सस्य तकनीक अग्र प्रस्तुत है-

भूमि का चुनाव

मटर के लिए उपजाऊ तथा जलनिकास वाली मिट्टी सर्वोत्तम है. इसकी खेती के लिए मटियार दोमट और दोमट मिट्टियाँ उपयुक्त रहती हैं. सिंचाई की सुविधा होने पर बलुआर दोमट भूमियों में भी मटर की खेती की जा सकती है. छत्तीसगढ़ में खरीफ में पड़ती भर्री-कन्हार एवं सिंचित डोरसा-भूमि में दाल वाली मटर या बटरी की खेती की जाती है. अच्छी फसल के लिए मृदा का पीएच मान 6.5-7.5 होना चाहिए.

खेत की तैयारी

रबी की फसलों की तरह मटर के लिए खेत तैयार किया जाता है. खरीफ की फसल काटने के बाद मिट्टी पलटने वाले हल से एक जुताई की जाती है. तत्पश्चात् 2 – 3 जुताइयाँ देशी हल से की जाती है. प्रत्येक जुताई के बाद खेत में पाटा चलाना आवश्यक है, जिससे ढेले टूट जाते हैं और भूमि में नमी का संरक्षण होता है. बोआई के समय खेत में पर्याप्त नमी का होना आवश्यक है.

उन्नत किस्मों का चयन

मटर की हरी फलियों वाली किस्मों को गार्डन पी तथा दाल के लिए उपयोगी किस्मों को फील्ड पी कहा जाता है. कम समय में आर्थिक लाभ के लिए मटर की खेती हरी फल्लिओं के लिए करना चाहिए. दोनों प्रकार की मटर की प्रमुख उन्नत किस्मों का विवरण अग्र प्रस्तुत है.
दाल वाली मटर की उन्नत किस्मों की विशेषताएँ

सब्जी वाला मटर की उन्नत किस्मों की विशेषताएँ
आर्केल: यह यूरोपियन झुर्रीदार बौनी लोकप्रिय किस्म है, . बुआई के 60 दिन बाद इसकी फल्लियाँ तोड़ने योग्य हो जाती हैं. फल्लियाँ 80 – 10 सेमी. लम्बी होती है, जिसमें 5-6 दाने होते है . हरी फल्लियों की उपज 80-90 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा इनकी तुड़ाई तीन बार में करते है .
बोनविले: यह अमेरिकन किस्म है. बीज झुर्रीदार तथा फल्लियाँ 80-90 दिन बाद तोड़ने योग्य हो जाती है. फूल की शाखा पर दो फल्लियाँ लगती है. हरी फल्लियों की उपज 100-120 क्विंटल/हेक्टेयर तक होती है.
जवाहर मटर 5: यह हरी फल्ली प्रदान करने वाली किस्म है . इसकी फल्लियाँ 65-70 दिन बाद तोड़ने योग्य हो जाती है. प्रत्येक फल्ली में 5-6 दाने बनते है. फल्लियों की उपज क्षमता 80-90 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.
जवाहर पी-83: मध्य समय में तैयार ¨ने वाली किस्म है जो भभूतिया रोग प्रतिरोधक भी है. पौधे छोटे , प्रति फली 8 दाने बनते है तथा 120-130 क्विंटल हरी फल्लियों की उपज क्षमता है.

बीज दर एवं बीजोपचार

बीज की मात्रा बोने के समय, किस्म और बोने कि विधि पर निर्भर करती है. स्वस्थ एवं प्रमाणित बीज ही प्रयोग करना चाहिए. अगेती बौनी किस्मों की बीज दर 100-120 किग्रा. तथा देर से पकने वाली लम्बी किस्मों के लिए 80-90 किग्रा. प्रति हेक्टेयर बीज पर्याप्त रहता है. बीज तथा भूमि जनित बीमारियों से बीज एवं पौधों की सुरक्षा के लिए थायरम या बाविस्टीन 3 ग्राम प्रति किलो बीज के हिसाब से बीजोपचार अवश्य करें. इसके पश्चात् बीज को राइजोबियम कल्चर एवं पी.एस.बी. कल्चर 5 ग्राम प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित कर छाया में सुखाकर सुबह या शाम को बोआई करना चाहिए.

बोआई का समय

मटर की अच्छी उपज लेने के लिए इसकी बोआई मध्य अक्टूबर से मध्य नवम्बर तक कर देना चाहिए. सिंचित अवस्था में बोआई 30 नवम्बर तक की जा सकती है. देर से बोआई करने पर उपज घट जाती है. हरी फल्लियों के लिए मटर की बोआई 20 सितम्बर से 15 अक्टूबर तक करना चाहिए. सितम्बर में बोई गई फसल में उकठा रोग होने ने की संभावना रहती है.

बोने की विधियाँ

मटर की बोआई अधिकतर हल के पीछे कूड़ों में की जाती है. अगेती बौनी किस्मों को 30 सेमी. तथा देर से पकने वाली किस्मों को 45 सेमी. की दूरी पर कतारों में बोना चाहिए. मटर की बोआई के लिए सीड ड्रील का भी उपयोग किया जा सकता है. पौधे से पौधे की दूरी 8-10 सेमी. तथा बीज की बोआई 4-5 सेमी. की गहराई पर करनी चाहिए. अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में अथवा बिलम्ब से तैयार होने वाली मटर की किस्मो को जमीन से उठी हुई क्यारियों (120-150 सेमी. चौड़ी क्यारी जिनके बीच में नाली छोड़ी जाती है) में बोना अच्छा रहता है.

खाद एवं उर्वरक

मटर की अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए संतुलित मात्रा में खाद एवं उर्वरक देना आवश्यक है . सिंचित दशा में खेत की अन्तिम जुताई के समय 8-10 टन प्रति हैक्टर गोबर की खाद या कम्पोस्ट मिट्टी में मिला देना चाहिए . उर्वरको की सही मात्रा का निर्धारण मृदा परीक्षण के आधार पर किया जा सकता है . दलहन फसल होने के कारण मटर को नाइट्रोजन की अधिक आवश्यकता नहीं होती है. सामान्यत: मटर फसल में 25-30 किग्रा. नत्रजन 40-50 किग्रा. स्फुर तथा 20 किग्रा. पोटाश तथा 20 किग्रा. सल्फर प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई के पहले कूंडों में देना चाहिए. असिंचित दशा में नत्रजन की मात्रा (20 किग्रा.) प्रयोग करना चाहिए. यथासंभव उर्वरकों को कूड़ में बीज से 2.5 सेमी. नीचे तथा 7-8 सेमी दूर डालना चाहिए. जस्ते की कमी वाले क्षेत्रों में 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट और 0.25 प्रतिशत चूना का घोल बनाकर रोग के लक्षण दिखते ही फसल पर छिड़क देना चाहिए.

सिंचाई

वैसे तो मटर की फसल प्रायः असिंचित क्षेत्रों में उगाई जाती है, परन्तु मटर की अच्छी उपज लेने के लिये दो सिचाई प्रथम बुवाई के 30-35 दिन बाद एवं द्वितीय 60 से 65 दिन बाद करना चाहिए. यथासंभव स्प्रिंकलर द्वारा सिंचाई करें या खेत में 3 मीटर की दूरी में नालियाँ बनाकर रिसाव पद्धति द्वारा सिंचाई करें. मटर में सदैव हल्की सिंचाई करनी चाहिये, क्योंकि अधिक पानी होने पर फसल पीली पड़कर सूख जाती है.

खरपतवार नियंत्रण

मटर में निराई-गुड़ाई फसल बोआई के 35-40 दिन बाद करने से खरपतवार समस्या कम हो जाती है. मटर की ऊँची किस्मों के सीधे खड़े रहने के लिए, जब पौधे 15 सेमी. ऊँचाई के हो जावें तब लकड़ी की खूंटियों का सहारा देना नितान्त आवश्यक रहता है. रासायनिक विधि से खरपतवार नियंत्रण के लिए बोआई के पहले खरपतवारनाशी जैसे बासालीन 0.75 लीटर या पेंडिमेथालीन 1 किलो सक्रिय तत्व अथवा मेट्रीब्यूजिन 1-1.5 किग्रा प्रति हैक्टर की दर से 800-1000 लीटर पानी में घोलकर फ्लेट फेन नोजल से छिड़काव कर मिट्टी में मिला देने से खरपतवार प्रकोप कम हो जाता है.

कीट नियंत्रण

मटर की फसल में तना छेदक, रोयेंदार गिडार, फली बेधक, लीफ माइनर तथा एफिड कीटों का प्रकोप देखा गया है. तना बेधक की रोकथाम के लिए बोने से पूर्व 30 किग्रा. फ्यूराडान 3 जी प्रति हेक्टेयर की दर से खेत मे मिला देनी चाहिए. पत्ती खाने वाली इल्ली तथा फली बेधक कीट को नष्ट करने के लिए मेलाथियान 50 ई. सी. की 1.25 लीटर की मात्रा को 500-600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़कना चाहिए. एफिड और लीफ माइनर के नियंत्रण हेतु मोनोक्रोटोफास 600 मिली. प्रति हेक्टेयर की दर से 600 लीटर पानी मे घोलकर फसल पर छिड़कना चाहिए. दवा का छिड़काव करने के 10-15 दिन पश्चात फल्लियों को सब्जी के लिए तोड़ना चाहिए.

रोग नियंत्रण

मटर के मुख्य रूप से उकठा, गेरूई, पाउडरी मिल्ड्यू तथा जड़ विगलन रोग लगता है. मटर की फसल जल्दी बोने से उकठा व जड़ विगलन रोग का प्रकोप होने की संम्भावना होती है. इनकी रोकथाम के लिए बीज को थीरम 2 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर बोना चाहिए. अधिक नमी वाले मौसम में या पछेती किस्मों में पाउडरी मिल्ड्यू रोग का प्रकोप अधिक होता है. रोग रोधी किस्म जैसे अपर्णा आदि लगायें. इस रोग की रोगथाम के लिए घुलनशील सल्फर जैसे सल्फेक्स या हैक्सासाल 3 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से 1000 लीटर पानी में घोलकर 2 – 3 छिड़़काव करना चाहिए. गेरूई (रस्ट) रोग से बचाव हेतु डाइथेन एम-45 या डाइथेन जेड-78, 2 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से 1000 लीटर पानी में घोलकर 2-3 बार छिड़काव करते है.

कटाई एवं गहाई

हरी फल्लियों के लिए बोई गई फसल दिसम्बर- जनवरी में फल्लियाँ देती है. फल्लियों को 10 – 12 दिन के अंतर पर 3 – 4 बार में तोड़ना चाहिए. तोड़ते समय फल्लियाँ पूर्ण रूप से भरी हुई होना चाहिए, तभी बाजार में अच्छा भाव मिलेगा. दानों वाली फसल मार्च अन्त या अप्रैल के प्रथम सप्ताह में पककर तैयार हो जाती है. फसल अधिक सूख जाने पर फल्लियाँ खेत में ही चटकने लगती है. इसलिये जब फल्लियाँ पीली पड़कर सूखने लगे उस समय कटाई कर लें. फसल को एक सप्ताह खलिहान में सुखाने के बाद बैलों की दाँय चलाकर गहाई करते है . दानों को साफ कर 4 – 5 दिन तक सुखाते है जिससे कि दानों में नमी का अंश 10 – 12 प्रतिशत तक रह जाये.

उपज एवं भण्डारण

मटर की हरी फल्लियों की पैदावार 150 -200 क्विंटल तथा फल्लियाँ तोड़ने के पश्चात् 150 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हरा चारा प्राप्त होता है. दाने वाली फसल से औसतन 20 – 25 क्विंटल दाना और 40 – 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर भूसा प्राप्त होता है. जब दानों मे नमी 8 – 10 प्रतिशत रह जाये तब सूखे व स्वच्छ स्थान पर दानो को भण्डारित करना चाहिए.

फसल चक्र

भिन्डी-मटर-कद्दू वर्गीय सब्जियां, कद्दू वर्गीय सब्जियां-मटर-बरबटी, बैंगन-मटर-भिन्डी, टमाटर-मटर-ककड़ी, धनिया (हरी पत्ती)-मटर-मिर्च एवं फ्रेंच बीन-मटर-धनिया फसल चक्र उत्तम है.
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Monday, May 18, 2015

उत्पादन बढ़ाना है तो लघु किसान को बचाना ही होगा



भारत में लघु, सीमांत किसानों और कृषि कामगारों के बिना कृषि की कल्पना नहीं की जा सकती और गांवों के बिना कोई लघु, सीमांत किसान और कृषि कामगार नहीं रह सकता. यह सामाजिक तौर पर देश के हित में है कि इन छोटी जोत वाले किसानों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी होती रहे पर साथ ही यह प्रयास होता रहे कि यें कृषि कार्यों से विमुख न हों. राष्ट्र को इन किसानों की उपज की उत्पादकता बढ़ाने में सहयोग देते रहना चाहिए. इन्हें आधुनिक संगत मशीनरी और खेती की नवीनतम पद्धति से भी परिचित कराते रहना चाहिए. कृषि वैज्ञानिक द्वारा समय-समय पर मौसम और फसल सम्बन्धी परामर्श मिलती रहनी चाहिए.
एक बार फिर बिन मौसम बारिश और दिल्ली में सार्वजनिक तौर पर हुई आत्महत्या ने भारत में लंबे समय से उपेक्षित पड़े कृषि और गांव के मुद्दे को फिर से चर्चा में ला दिया.
विकास यानी शहरीकरण
स्वतंत्रता के बाद शहरीकरण विकास की पूर्व शर्त बन गया. यह माना गया की बिना शहरीकरण हुए गाँवों का विकास नहीं हो सकता. इससे पलायन बढ़ा और गांव हाशिये पर चले गए. शहरों का विस्तार होता गया और वे गाँवों में घुस कर उसे शहर बनाने लगे. उपजाऊ जमींन बिचने लगी और कंक्रीट का फैलाव होता गया. महंगे बीज, उर्वरक और कीटनाशक, गिरता भूजल स्तर, बढ़ती मजदूरी के कारण खेती की लागत में बेतहाशा बढ़ोतरी हो चुकी है. ऐसे में बिना कर्ज लिए खेती संभव नहीं रह गई है. गांवों में आज गरीबी की निशानी कच्चा घर बन गया है. सभी दल ग्रामीण इलाकों के हितों के नारे लगाते हैं और गांवों, ग्रामीणों और खेती को प्रोत्साहित करने की बात करते हैं.
यह विडंबना ही है कि जिस देश में दो तिहाई लोग खेती पर आश्रित हैं और गांवों में रहते हैं, उस किसान को सिर्फ वोट की नजर से देखा जाता है. राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) की 2003 की रिपोर्ट कहती है कि यदि कृषि से अलग अन्य कोई स्थाई रोजगार मिले तो देश के 40 फीसदी किसान खेती छोड़ने को तैयार हैं. फिर इन परिस्थितियों में भारत के समक्ष खेती और खाद्य सुरक्षा का सबसे बड़ा खतरा उत्पन्न होना है. विषय का पूर्व संदर्भ और मूल कारणों को जाने बिना ग्रामीण और कृषि अर्थशास्त्र के संकट की भयावहता को समझ पाना दुष्कर है. वास्तव में ईमानदारी से सब बातों को समझने की आवश्यकता है.
पर्याय हैं गांव और कृषि
भारत में ग्रामीण जीवन को कृषि से अलग किया ही नहीं जा सकता. भारत में कृषि का भविष्य गांवों पर आधारित है. यदि भारत में गांव नहीं रहे तो खेती समाप्त हो जाएगी. भारत में खेती के लिए गांव इसलिए जरूरी हैं क्योंकि छोटे और सीमांत किसान जिनके पास पांच एकड़ से कम भूमि है, वे खेती पर आश्रित जनसंख्या का 85 प्रतिशत हैं. वे केवल गांवों में ही रहते हैं. उनके बिना भारतीय खेती मर जाएगी. वर्ष 2050 में भारत की जनसंख्या यदि 160 करोड़ रही तो ग्रामीण जनसंख्या इसकी आधी होगी. दस साल पहले भारत में लघु और सीमांत किसान परिवारों की संख्या 9.80 करोड़ थी जो अब 11.70 करोड़ हो गई है.
कृषि जनसंख्या के आंकड़ों के मुताबिक लघु और सीमांत किसान परिवार घरों की संख्या, कुल 13.80 करोड़ किसान परिवार घरों का 85 फीसदी है. उल्लेखनीय है कि 1961 में इनकी संख्या 62 फीसदी, 1991 में 78 फीसदी, 2001 में 81 फीसदी और 2011 में 85 फीसदी हो गई.
मजेदार तथ्य यह भी है कि लघु और सीमांत किसान बड़े खेतों वाले किसानों के मुकाबले कम क्षमतावान हों, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है बल्कि ये अपेक्षाकृत अधिक उत्पादक हैं. ये 46 फीसदी खेती योग्य भूमि कृषि के काम लेते हैं और 52 फीसद अनाज, 70 फीसदी सब्जियां और 55 फीसदी फलों की पैदावार के साथ 69 फीसदी दूध भी संकलित करते हैं.
रूस में घरेलू पारिवारिक खेती करने वालों के पास तीन फीसदी कृषि योग्य भूमि है लेकिन रूस के लोगों द्वारा खाई जाने वाले सामग्री का 50 फीसदी पैदा करते हैं.
स्पष्ट हैं समीकरण
1950-51 में देश के जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान 55% था जो कि आज 15% से भी कम रह गया है जबकि इस दौरान कृषि पर निर्भर लोगों की तादाद 24 करोड़ से बढ़कर 72 करोड़ हो गई है. यही कारण है कि खेती पर निर्भर लोगों की आमदनी घटती जा रही है. कृषि क्षेत्र में कम आमदनी के कारण ही गांवों से शहरों की ओर पलायन शुरू हो गया है. इसकी पुष्टि 2011 की जनगणना के आंकड़ों से होती है जिसके मुताबिक पिछले एक दशक में किसानों की कुल तादाद में 90 लाख की कमी आई है, अर्थात हर रोज 2460 किसान खेती छोड़ रहे हैं. सच्चाई यह है कि छोटे किसान मजदूर बन रहे हैं. उन्हें देश के किसी भी महानगर के दड़बेनुमा कमरों में देखा जा सकता है.
भारत में लघु और सीमांत किसान अधिकतर अपने इस्तेमाल के लिए ही खेती करते हैं. यूएनडीपी की 2009 की रिपोर्ट के मुताबिक खाद्य पैदावार के कुल बाजार अधिशेष में इनकी हिस्सेदारी 20 फीसदी है. भारत की खाद्य सुरक्षा उन्हीं पर निर्भर रहती है. खाद्य एवं कृषि संगठन के मुताबिक भारत की कृषि अर्थव्यवस्था इन लघु व सीमांत किसानों पर ही बहुत अधिक निर्भर है.
जाहिर है की भारत में खाद्य सुरक्षा और कृषि अर्थव्यवस्था के लिए लघु किसान और लघु खेती का जीवित रहना आवश्यक है? लघु किसान अपने खेतों पर नहीं, वे इनके आसपास ही रहते हैं. उन्हें खेतों से अलग नहीं किया जा सकता. वे कस्बों और शहरों में रहकर खेती का प्रबंधन नहीं कर सकते. उन्हें गांवों में ही रहना पड़ेगा. उन्हें रहने के लिए गांवों की आवश्यकता है. समीकरण बिलकुल स्पष्ट है.
भारत में लघु और सीमांत किसानों के बिना कृषि की कल्पना नहीं की जा सकती और गांवों के बिना कोई लघु और सीमांत किसान नहीं रह सकता. वे भारत के कृषि के लिए  महत्वपूर्ण संपत्ति हैं. यह सामाजिक तौर पर देश के हित में है कि इन छोटी जोत वाले किसानों की संख्या में बढ़ोतरी होती रहे. राष्ट्र को इन किसानों की उपज की उत्पादकता बढ़ाने में सहयोग देना चाहिए. इन्हें अधिक से अधिक साधन-संपन्न बनाना चाहिए.
यह भी सही है की छोटे किसान यदि अपना सादा जीवन फिर अपना सके, खेतों को फिर से रसायनों से मुक्त कर जैविक बना सके और शहर के दिखावा को छोड़ सके तो न तो कर्ज की नौबत आएगी और न आत्महत्या की.